नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शराबबंदी की प्रभावशीलता पर चर्चा करते हुए इससे जुड़े कुछ संभावित दुष्प्रभावों और चुनौतियों का उल्लेख किया है। शुक्रवार को न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने महाराष्ट्र पॉइजन रूल्स के नियम 18ए और 18बी को रद्द करने के मामले की सुनवाई के दौरान शराबबंदी से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर टिप्पणी की।
रिपोर्ट के अनुसार, अदालत के समक्ष शराबबंदी से जुड़े पांच प्रमुख मुद्दों का उल्लेख हुआ। इनमें सरकारी राजस्व में कमी, शराबबंदी लागू करने की लागत, पुलिस तंत्र में भ्रष्टाचार की आशंका, अवैध एवं नकली शराब का कारोबार और अन्य नशीले पदार्थों की ओर रुख बढ़ने का खतरा शामिल हैं।
जहरीली शराब की घटनाओं का भी जिक्र
सुनवाई के दौरान अदालत ने गुजरात और अन्य राज्यों में जहरीली शराब से हुई घटनाओं का भी उल्लेख किया। रिपोर्ट के मुताबिक, पीठ ने भावनगर (गुजरात) और सागर (मध्य प्रदेश) में हुई जहरीली शराब की घटनाओं का संदर्भ देते हुए इन्हें प्रशासन के लिए कार्रवाई का संकेत बताया।
मामला महाराष्ट्र में मेथनॉल की खरीद और उसके इस्तेमाल से जुड़े नियमों से संबंधित था। अदालत ने कहा कि संबंधित नियमों और जहरीली शराब की घटनाओं को रोकने के उद्देश्य के बीच पर्याप्त तर्कसंगत संबंध स्थापित नहीं किया जा सका।
रिपोर्ट के अनुसार, पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि केवल किसी नियम के पीछे अच्छी मंशा होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस नियम की प्रभावशीलता और उसके उद्देश्य के बीच स्पष्ट संबंध होना चाहिए।

