मिट्टी को आकार देकर रोजी-रोटी कमाने वाले कारीगरों की मेहनत आज भी ग्रामीण और कस्बाई जीवन की पारंपरिक पहचान बनी हुई है। लार नगर के सोनबरिया निवासी मैनेजर पिछले करीब 40 वर्षों से मिट्टी को कभी देवी-देवताओं की मूर्तियों तो कभी घरेलू उपयोग के बर्तनों का रूप देकर अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं। बाजार में आधुनिक सामानों की बढ़ती पहुंच के बावजूद उन्होंने मिट्टी और चाक से अपना रिश्ता कायम रखा है।
मैनेजर ने करीब चार दशक पहले मिट्टी से मूर्ति और बर्तन बनाने का काम शुरू किया था। जून से अक्टूबर तक वह मुख्य रूप से मूर्ति निर्माण में जुटे रहते हैं। इस दौरान उनके साथ विशाल और विजय भी दिन-रात मेहनत करते हैं। मूर्ति निर्माण के सीजन में मिट्टी, रंग, मजदूरी और अन्य खर्च निकालने के बाद परिवार के लिए करीब 15 हजार रुपये तक की बचत हो पाती है।
मूर्ति निर्माण के बाद बर्तनों का सहारा
मूर्ति निर्माण का सीजन समाप्त होने के बाद मैनेजर फिर मिट्टी के बर्तन बनाने में जुट जाते हैं। उनके लिए यह काम केवल आमदनी का जरिया नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत से बनी पहचान भी है। मिट्टी के बर्तन बनाना उनके लिए सालभर आय का एक सहारा है, जिसके जरिए वह घर-गृहस्थी चलाने की कोशिश करते हैं।
हर मूर्ति के पीछे घंटों की मेहनत
बाजार में मिट्टी की मूर्ति भले ही एक तैयार वस्तु के रूप में दिखाई देती हो, लेकिन उसके पीछे कारीगर की कई घंटों की मेहनत, कौशल और धैर्य होता है। मैनेजर के हाथों से तैयार होने वाली मूर्तियां और मिट्टी के बर्तन उनके पारंपरिक हुनर की कहानी बयां करते हैं।
आधुनिक सामानों की बढ़ती मांग के बीच भी मैनेजर और उनका परिवार इस पारंपरिक काम से जुड़ा हुआ है। उनका कहना है कि चाक और मिट्टी से जुड़ा हुनर ही उनकी रोजी-रोटी और पहचान है। उनके साथ नई पीढ़ी के विशाल और विजय भी इस कला को आगे बढ़ाने में जुटे हैं।
करीब चार दशक बीत जाने के बाद भी मैनेजर का चाक लगातार घूम रहा है। मिट्टी से उनका रिश्ता आज भी कायम है और उनका हुनर बताता है कि मेहनत और नई पीढ़ी के सहयोग से पारंपरिक कारीगरी को आगे बढ़ाया जा सकता है।

