उत्तराखंड की प्रसिद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा नंदा देवी राजजात को लेकर श्रद्धालुओं में उत्साह है। करीब 12 साल के अंतराल के बाद मां नंदा देवी की बड़ी जात यात्रा आयोजित होने जा रही है। हिमालय की दुर्गम पहाड़ियों से होकर गुजरने वाली यह यात्रा धार्मिक आस्था के साथ-साथ उत्तराखंड की लोक संस्कृति और परंपराओं का भी महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।
296 किलोमीटर की होगी पैदल यात्रा
मां नंदा देवी की बड़ी जात यात्रा में श्रद्धालु करीब 296 किलोमीटर की दूरी पैदल तय करेंगे। यात्रा का मार्ग उत्तराखंड के पर्वतीय और बेहद दुर्गम इलाकों से होकर हिमालय की ऊंचाइयों तक पहुंचता है। अंतिम पड़ाव को मां नंदा देवी का मायका छोड़कर कैलास गमन की धार्मिक मान्यता से जोड़ा जाता है।
यात्रा के दौरान श्रद्धालु कठिन चढ़ाई, पथरीले रास्तों और बदलते मौसम का सामना करते हुए आगे बढ़ेंगे। इसी वजह से नंदा देवी राजजात को हिमालय की सबसे कठिन धार्मिक यात्राओं में गिना जाता है।
मां नंदा को विदा करने की परंपरा
उत्तराखंड में मां नंदा देवी को बेटी और देवी के रूप में पूजा जाता है। राजजात के दौरान श्रद्धालु मां नंदा को उनके मायके से कैलास के लिए विदा करने की परंपरा निभाते हैं। यात्रा से जुड़े अनुष्ठानों में स्थानीय देवी-देवताओं, ढोल-दमाऊं और पारंपरिक रीति-रिवाजों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
12 साल में एक बार निकलती है राजजात
नंदा देवी राजजात का आयोजन पारंपरिक रूप से 12 वर्ष के अंतराल पर किया जाता है। पिछली बड़ी राजजात वर्ष 2014 में निकली थी। इसके बाद अब 2026 में एक बार फिर इस ऐतिहासिक यात्रा का आयोजन श्रद्धा और उत्साह के साथ किया जा रहा है।
यह यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति, सामाजिक एकजुटता और सदियों पुरानी परंपराओं का जीवंत उदाहरण भी है।
यात्रा को लेकर प्रशासन ने की तैयारियां
इतनी लंबी और कठिन यात्रा को देखते हुए प्रशासन तथा स्थानीय स्तर पर व्यवस्थाओं को लेकर तैयारियां की गई हैं। यात्रियों के लिए मार्ग, सुरक्षा, चिकित्सा, पेयजल और अन्य आवश्यक सुविधाओं पर ध्यान दिया जा रहा है। हिमालयी क्षेत्र में मौसम तेजी से बदलने की संभावना को देखते हुए यात्रियों को सावधानी बरतने की सलाह भी दी जाती है।
आस्था, परंपरा और हिमालय का संगम
नंदा देवी राजजात में शामिल श्रद्धालुओं के लिए यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि मां नंदा के कैलास गमन की भावनात्मक यात्रा भी है। करीब 296 किलोमीटर के कठिन पैदल मार्ग पर श्रद्धालुओं की आस्था ही सबसे बड़ी ताकत होती है। 12 साल बाद होने वाली इस बड़ी जात को लेकर पूरे उत्तराखंड में विशेष उत्साह देखने को मिल रहा है।

