वही जहर, वही चाल, बदल गया सिर्फ चेहरा—क्या हम फिर उसी जाल में फंसेंगे?

विशेष संपादकीय |

सोचिए… करीब तीन सौ साल पहले जिस देश की वैश्विक अर्थव्यवस्था में हिस्सेदारी करीब एक-चौथाई के आसपास बताई जाती थी, वह देश कुछ ही दशकों में आर्थिक रूप से इतना कमजोर कैसे हो गया कि उसके पारंपरिक उद्योग और कारीगर तबाह होने लगे? इतिहास इस सवाल के कई जवाब देता है, लेकिन उनमें एक महत्वपूर्ण शब्द है—विभाजन

अंग्रेजी शासन ने भारत के आर्थिक संसाधनों और पारंपरिक उद्योगों का व्यापक दोहन किया। साथ ही, सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर अलग-अलग समूहों के बीच मौजूद विभाजनों को संस्थागत रूप देने वाली नीतियां भी अपनाई गईं। आजादी के करीब आठ दशक बाद सवाल यह है कि क्या हम इतिहास से सबक ले पाए हैं?

क्योंकि आज भी चुनाव आते ही जाति, धर्म और समुदाय की पहचान अचानक राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ जाती है।

जब भारतीय हुनर ने दुनिया में बनाई पहचान

औपनिवेशिक शासन से पहले भारत कपड़ा, धातु, हस्तशिल्प और कई अन्य क्षेत्रों में अपनी मजबूत उत्पादन क्षमता के लिए जाना जाता था। बुनकर, सुनार, लोहार, तेली और अन्य पारंपरिक कारीगर समुदायों के कौशल ने भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत आधार दिया था।

आर्थिक इतिहासकार एंगस मैडिसन के अनुमानों के अनुसार, 1700 के आसपास वैश्विक GDP में भारत की हिस्सेदारी लगभग 24 प्रतिशत थी। 1750 के आसपास भी भारत दुनिया की प्रमुख आर्थिक शक्तियों में शामिल था।

यह तस्वीर बताती है कि भारत की आर्थिक कमजोरी कोई प्राकृतिक स्थिति नहीं थी। औपनिवेशिक नीतियों, व्यापारिक असमानताओं और संसाधनों के दोहन ने भारतीय अर्थव्यवस्था को गहरा नुकसान पहुंचाया।

अंग्रेजों की व्यापार नीति और भारतीय उद्योगों पर असर

ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय वस्त्र उद्योग को भारी प्रतिस्पर्धात्मक दबाव का सामना करना पड़ा। ब्रिटेन में भारतीय कपड़ों पर ऊंचे शुल्क लगाए गए, जबकि ब्रिटिश निर्मित वस्तुओं को भारतीय बाजार में अपेक्षाकृत बेहतर पहुंच मिली।

इसका सबसे बड़ा असर भारतीय बुनकरों और हस्तकरघा उद्योग पर पड़ा।

1830 के दशक में तत्कालीन गवर्नर-जनरल विलियम बैंटिक से जुड़ा वह प्रसिद्ध कथन भी इतिहास में दर्ज है, जिसमें बंगाल के बुनकरों की दुर्दशा का उल्लेख किया गया था। हालांकि इस कथन के सटीक शब्दों और आंकड़ों को लेकर इतिहासकारों के बीच मतभेद रहे हैं, लेकिन इस बात पर व्यापक सहमति है कि औपनिवेशिक दौर में भारतीय पारंपरिक वस्त्र उद्योग को गंभीर क्षति पहुंची।

ढाका, जो कभी विश्व प्रसिद्ध मलमल उत्पादन का केंद्र था, उसकी आर्थिक स्थिति भी धीरे-धीरे कमजोर हुई।

यानी आर्थिक शोषण सिर्फ आंकड़ों की कहानी नहीं था। इसके पीछे लाखों कारीगरों, किसानों और छोटे उत्पादकों की बदलती जिंदगी थी।

आर्थिक शोषण के साथ सामाजिक विभाजन की राजनीति

औपनिवेशिक शासन की एक दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता थी—राजनीतिक प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक व्यवस्था में समुदाय आधारित पहचान का बढ़ता महत्व।

1909 के मॉर्ले-मिंटो सुधारों के तहत मुस्लिम समुदाय के लिए पृथक निर्वाचन व्यवस्था लागू की गई। बाद में 1932 के कम्युनल अवॉर्ड ने विभिन्न सामाजिक और धार्मिक समूहों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर नई व्यवस्थाएं सामने रखीं।

इन नीतियों की ऐतिहासिक व्याख्या को लेकर बहस आज भी जारी है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि ब्रिटिश भारत की राजनीति में सामुदायिक पहचान एक महत्वपूर्ण राजनीतिक उपकरण बन चुकी थी।

यही वजह है कि इतिहास हमें एक बड़ा सबक देता है—जब नागरिक अपनी साझा समस्याओं की जगह केवल पहचान के आधार पर राजनीतिक निर्णय लेने लगते हैं, तो असली मुद्दे पीछे छूट सकते हैं।

क्या आज भी चुनावों में वही खेल दोहराया जा रहा है?

अब सवाल आज का है।

चुनाव आते ही जाति और धर्म की चर्चा अचानक क्यों बढ़ जाती है?

जो लोग पूरे साल एक-दूसरे के पड़ोसी, दोस्त और कारोबारी साथी होते हैं, वे मतदान के समय “अपनी बिरादरी” और “अपने समुदाय” के नाम पर अलग-अलग खेमों में क्यों दिखाई देने लगते हैं?

जाति और समुदाय की पहचान लोकतंत्र में अपने आप में गलत नहीं है। भारत में सामाजिक रूप से वंचित और हाशिये पर रहे समूहों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिलाने में पहचान आधारित राजनीति की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब पहचान जनता के अधिकारों और विकास के सवालों पर हावी हो जाए।

जब सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और कानून-व्यवस्था जैसे सवाल पीछे छूट जाएं और चुनाव सिर्फ जातीय या धार्मिक समीकरणों तक सीमित हो जाएं, तब लोकतंत्र की गुणवत्ता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

आज का टैरिफ और औपनिवेशिक दौर—समानता सिर्फ सतही है

हाल के वर्षों में भारत को अमेरिकी व्यापार नीतियों और टैरिफ के दबाव का सामना करना पड़ा है। सतह पर यह औपनिवेशिक दौर की व्यापारिक बाधाओं की याद दिला सकता है, लेकिन दोनों परिस्थितियों के बीच बुनियादी अंतर समझना बेहद जरूरी है।

तब भारत एक उपनिवेश था। आज भारत एक संप्रभु राष्ट्र है।

तब व्यापार नीति पर अंतिम निर्णय भारत के हाथ में नहीं था। आज भारत अपने व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए बातचीत, कूटनीति और जवाबी नीतियों का इस्तेमाल कर सकता है।

यही अंतर भारत की सबसे बड़ी ताकत है।

भारत की आर्थिक स्थिति में पिछले दशकों में बड़ा बदलाव आया है। प्रवासी भारतीयों से आने वाले धन ने भी अर्थव्यवस्था को महत्वपूर्ण सहारा दिया है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत को रिकॉर्ड स्तर पर करीब 135 अरब डॉलर से अधिक का रेमिटेंस प्राप्त हुआ।

यह तस्वीर बताती है कि आज भारत की आर्थिक शक्ति केवल घरेलू उत्पादन तक सीमित नहीं है। दुनिया भर में रहने वाले भारतीय भी देश की अर्थव्यवस्था से जुड़े हुए हैं।

बाहर की चुनौती का सामना कर सकते हैं, तो अंदर की फूट क्यों नहीं छोड़ सकते?

यही इस पूरे विमर्श का सबसे बड़ा सवाल है।

अगर भारत बाहरी आर्थिक दबावों के बीच अपनी विकास यात्रा जारी रख सकता है, तो क्या भारतीय मतदाता अपने भीतर के राजनीतिक विभाजन से ऊपर नहीं उठ सकता?

अगर कोई सरकार या राजनीतिक दल सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर बेहतर प्रदर्शन करता है, तो उसका मूल्यांकन उन्हीं मुद्दों पर क्यों न हो?

सरकार की विभिन्न योजनाओं में बुनकरों, कारीगरों, पिछड़े वर्गों, विद्यार्थियों और छोटे उद्यमियों के लिए अलग-अलग प्रावधान किए गए हैं। लेकिन लोकतंत्र में योजनाओं से भी बड़ा सवाल है—क्या उनका लाभ वास्तव में जरूरतमंद तक पहुंच रहा है?

मतदाता को यही सवाल पूछना चाहिए।

पहचान की राजनीति बनाम विकास की राजनीति

जाति और समुदाय की सामाजिक वास्तविकता को नकारना समाधान नहीं है। भारत जैसे विविध समाज में हर समूह की अपनी ऐतिहासिक परिस्थितियां और समस्याएं हैं।

लेकिन चुनावी राजनीति का अंतिम उद्देश्य केवल पहचान को मजबूत करना नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाना होना चाहिए।

इसलिए अगली बार जब कोई नेता आपसे जाति या धर्म के नाम पर वोट मांगने आए, तो उससे एक और सवाल पूछिए—

आपने हमारे इलाके के लिए क्या किया?

कितनी सड़कें बनीं?

कितने रोजगार आए?

अस्पताल में डॉक्टर और दवाएं हैं या नहीं?

स्कूलों की स्थिति कैसी है?

पानी और बिजली की समस्या कितनी कम हुई?

युवाओं के लिए अवसर कितने बढ़े?

और सबसे महत्वपूर्ण—पिछले पांच साल में आपके जीवन में वास्तव में क्या बदला?

लोकतंत्र का असली गणित

राजनीति में एक सीधा सिद्धांत काम करता है—जिस चीज की जनता मांग करती है, राजनीतिक दल उसी पर अधिक जोर देने के लिए मजबूर होते हैं।

यदि मतदाता जातीय समीकरण को प्राथमिकता देगा, तो राजनीतिक दल जातीय समीकरण साधेंगे।

यदि मतदाता धार्मिक ध्रुवीकरण को प्राथमिकता देगा, तो वही राजनीति मजबूत होगी।

लेकिन यदि मतदाता विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और स्थानीय समस्याओं को चुनाव का मुख्य मुद्दा बना दे, तो राजनीतिक दलों को भी अपना एजेंडा बदलना पड़ेगा।

यही लोकतंत्र की वास्तविक ताकत है।

अब फैसला आपका है

इतिहास हमें यह जरूर सिखाता है कि कमजोर सामाजिक एकजुटता और आर्थिक असमानता किसी भी देश को कमजोर कर सकती है। लेकिन इतिहास को आज की राजनीति पर हूबहू लागू करना भी सही नहीं होगा।

अंग्रेजों का दौर अलग था। आज का भारत अलग है।

फिर भी एक सबक आज भी उतना ही प्रासंगिक है—भारत की विविधता उसकी कमजोरी नहीं, उसकी ताकत है।

जाति हो या धर्म, भाषा हो या क्षेत्र—पहचान अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन लोकतंत्र में नागरिक की सबसे बड़ी पहचान उसका वोट और उसका अधिकार है।

इसलिए अगली बार जब कोई आपके मन में जाति या धर्म के नाम पर राजनीतिक जहर घोलने की कोशिश करे, तो एक पल रुकिए और पूछिए—

“मेरे वोट के बदले मेरे इलाके को क्या मिला?”

इतिहास को दोहराना है या उससे सीखकर आगे बढ़ना है, यह फैसला किसी नेता के हाथ में नहीं है।

यह फैसला मतदाता के हाथ में है।

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