नई दिल्ली। भारत की मेजबानी में नई दिल्ली में हो रहे BRICS शिखर सम्मेलन के बीच अमेरिका को लेकर सदस्य देशों के बीच मतभेद और तीखे बयान चर्चा में हैं। रूस और ईरान ने अमेरिका की नीतियों तथा उसके सैन्य कदमों पर कड़ा रुख जाहिर किया है। ऐसे माहौल में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती सम्मेलन को किसी एक देश या गुट के खिलाफ मंच बनने से रोकते हुए सभी सदस्य देशों के बीच सहमति कायम रखने की है।
रूस और ईरान का अमेरिका पर निशाना
BRICS सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब रूस-यूक्रेन संघर्ष और पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने वैश्विक राजनीति को प्रभावित किया हुआ है। रूस और ईरान दोनों ही अमेरिका और पश्चिमी देशों की नीतियों के मुखर आलोचक रहे हैं।
सम्मेलन के दौरान इन देशों की ओर से अमेरिकी दबाव, प्रतिबंधों और सैन्य कार्रवाई को लेकर आपत्तियां उठाई गई हैं। दोनों देशों का जोर BRICS देशों के बीच आर्थिक और रणनीतिक सहयोग को मजबूत करने तथा बाहरी दबावों से निपटने की क्षमता बढ़ाने पर है।
भारत के लिए क्यों मुश्किल है संतुलन?
भारत के रूस के साथ लंबे समय से रणनीतिक संबंध हैं। वहीं ईरान के साथ भी भारत के महत्वपूर्ण आर्थिक और क्षेत्रीय हित जुड़े हैं। दूसरी ओर अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ भारत की रणनीतिक साझेदारी लगातार मजबूत हुई है।
ऐसे में नई दिल्ली के लिए यह जरूरी है कि BRICS के मंच पर किसी विवादित भू-राजनीतिक मुद्दे पर ऐसा रुख न बने जिससे भारत के अन्य प्रमुख साझेदारों के साथ उसके संबंध प्रभावित हों।
भारत BRICS को मुख्य रूप से आर्थिक सहयोग, विकास, वैश्विक संस्थाओं में सुधार और ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करने वाले मंच के रूप में आगे बढ़ाना चाहता है।
BRICS में भी एक जैसी सोच नहीं
BRICS के विस्तार के बाद संगठन में देशों की संख्या और प्रभाव बढ़ा है, लेकिन इसके साथ अलग-अलग देशों के हित भी सामने आए हैं।
रूस और चीन BRICS को पश्चिमी प्रभुत्व के मुकाबले एक मजबूत बहुध्रुवीय मंच के रूप में देखते हैं। दूसरी ओर भारत और ब्राजील आर्थिक सहयोग तथा वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों को अधिक प्राथमिकता देते हैं। इन अलग-अलग दृष्टिकोणों के कारण किसी संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर सभी देशों की एक राय बनाना आसान नहीं है।
ईरान-अमेरिका तनाव का भी असर
पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच जारी टकराव का असर BRICS के भीतर भी दिखाई दे रहा है। ईरान BRICS का सदस्य है, जबकि संगठन में ऐसे देश भी हैं जिनके अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ मजबूत संबंध हैं।
इस स्थिति में यदि सम्मेलन के दौरान अमेरिका की नीतियों को लेकर तीखी भाषा इस्तेमाल होती है, तो भारत के लिए सभी सदस्य देशों को एक साझा एजेंडे पर लाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
संयुक्त घोषणा पर भी रहेगी नजर
BRICS के विस्तार के बाद किसी साझा बयान पर सहमति बनाना पहले की तुलना में अधिक जटिल हो गया है। अलग-अलग देशों के क्षेत्रीय और विदेश नीति संबंधी हित कई मुद्दों पर एक-दूसरे से अलग हैं।
ऐसे में भारत की अध्यक्षता के दौरान यह महत्वपूर्ण होगा कि शिखर सम्मेलन से निकलने वाला संदेश आर्थिक सहयोग और विकास के साझा मुद्दों पर केंद्रित रहे और सदस्य देशों के बीच मतभेदों के बावजूद न्यूनतम साझा सहमति कायम हो। हालिया बैठकों में कुछ मुद्दों पर संयुक्त रुख बनाने में कठिनाई सामने आ चुकी है।
भारत की रणनीति पर सबकी नजर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही अलग-अलग BRICS नेताओं के साथ द्विपक्षीय बातचीत कर रहे हैं। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन के साथ भारत की बातचीत में भी शांति, स्थिरता और कूटनीतिक समाधान पर जोर दिया गया है।
भारत की कोशिश संभवतः यही रहेगी कि BRICS का एजेंडा किसी एक भू-राजनीतिक विवाद तक सीमित न होकर व्यापार, निवेश, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, तकनीक, वैश्विक वित्तीय व्यवस्था और विकास जैसे व्यापक मुद्दों पर केंद्रित रहे। सम्मेलन के एजेंडे में भी इन विषयों को प्रमुखता दी गई है।
क्या भारत बना पाएगा साझा सहमति?
नई दिल्ली में जुटे BRICS नेताओं के सामने जहां वैश्विक आर्थिक सहयोग बढ़ाने का अवसर है, वहीं बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव संगठन की एकजुटता की परीक्षा भी ले रहे हैं।
भारत के लिए सफलता का पैमाना सिर्फ सम्मेलन का आयोजन नहीं, बल्कि अलग-अलग हितों वाले सदस्य देशों को एक साझा एजेंडे पर साथ लाना होगा। यदि नई दिल्ली आर्थिक और विकास से जुड़े मुद्दों पर व्यापक सहमति बनाने में सफल रहती है, तो यह भारत की कूटनीतिक क्षमता के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाएगी।

