नई दिल्ली। नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिका की नीतियों को लेकर रूस और ईरान के रुख ने वैश्विक कूटनीति का ध्यान खींचा। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के बीच BRICS मंच पर एकतरफा आर्थिक दबाव तथा सैन्य कार्रवाई के खिलाफ आवाजें उठीं। ऐसे माहौल में भारत के सामने संगठन के भीतर अलग-अलग हितों और विचारों के बीच सहमति कायम रखने की बड़ी चुनौती थी।
रूस और ईरान ने उठाया अमेरिकी नीतियों का मुद्दा
BRICS बैठक के दौरान रूस और ईरान ने अमेरिका की नीतियों और प्रतिबंधों पर कड़ा रुख अपनाया। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने ऐसे अंतरराष्ट्रीय माहौल की जरूरत बताई, जिसमें किसी देश को वैध व्यापार और आर्थिक गतिविधियों में बाधा डालने की अनुमति न हो। वहीं रूस ने भी पश्चिमी आर्थिक दबाव और प्रतिबंधों के प्रभाव को लेकर अपनी आपत्तियां सामने रखीं।
BRICS के संयुक्त घोषणा-पत्र में भी एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों और दूसरे देशों पर लगाए जाने वाले दबावकारी उपायों का विरोध किया गया। घोषणा में कहा गया कि ऐसे कदम अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हैं और इनका असर आम आबादी पर भी पड़ता है।
पश्चिम एशिया संकट ने बढ़ाई मुश्किल
इस बार BRICS सम्मेलन ऐसे समय हुआ जब अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव जारी है। इसके अलावा पश्चिम एशिया में व्यापक अस्थिरता और यूक्रेन युद्ध ने भी सम्मेलन के एजेंडे को प्रभावित किया।
सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि BRICS में ईरान के साथ संयुक्त अरब अमीरात भी शामिल है, जिसके अमेरिका के साथ करीबी संबंध हैं। इसके बावजूद सदस्य देशों ने बातचीत और कूटनीति के जरिए साझा घोषणा पर सहमति बनाने की कोशिश की।
भारत ने अपनाया संतुलित कूटनीतिक रुख
मेजबान भारत के लिए यह सम्मेलन इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि उसे रूस और ईरान जैसे देशों के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को बनाए रखते हुए अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों में भी संतुलन कायम रखना है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने BRICS मंच से संघर्षों के समाधान के लिए संवाद, सहयोग और कूटनीति पर जोर दिया। उन्होंने वैश्विक तनाव, आपूर्ति शृंखला में व्यवधान और बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों को दुनिया की अर्थव्यवस्था और आम लोगों के लिए चुनौती बताया।
प्रतिबंधों और डॉलर के विकल्प पर बढ़ी चर्चा
BRICS देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा-पार भुगतान व्यवस्था को मजबूत करने पर भी चर्चा हुई। भारत ने BRICS देशों के केंद्रीय बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) को जोड़ने की संभावनाओं को आगे बढ़ाने की कोशिश की है, हालांकि इसके सामने तकनीकी और नीतिगत चुनौतियां भी हैं।
यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि रूस और ईरान जैसे देश पश्चिमी प्रतिबंधों से प्रभावित हैं और BRICS के भीतर वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था विकसित करने में उनकी विशेष रुचि है।
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या?
भारत के सामने सबसे अहम चुनौती BRICS को किसी एक देश या गुट के खिलाफ राजनीतिक मंच बनने से रोकते हुए इसे आर्थिक और विकास संबंधी सहयोग का प्रभावी मंच बनाए रखना है।
BRICS में चीन, रूस और ईरान जैसे देशों के अमेरिका के साथ गंभीर मतभेद हैं, जबकि भारत के अमेरिका के साथ भी व्यापक रणनीतिक और आर्थिक संबंध हैं। इसलिए नई दिल्ली को संगठन के भीतर ऐसी भाषा और नीतियों को बढ़ावा देना होगा, जिससे अलग-अलग सदस्य देशों के हितों के बावजूद साझा एजेंडा आगे बढ़ सके।
साझा घोषणा पर बनी सहमति
कठिन भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बावजूद BRICS देशों ने नई दिल्ली घोषणा-पत्र को स्वीकार किया। इसमें बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, वैश्विक संस्थाओं में सुधार, विकासशील देशों की अधिक भागीदारी, व्यापार सहयोग, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा तथा संघर्षों के शांतिपूर्ण समाधान जैसे मुद्दों पर जोर दिया गया।
सम्मेलन के अंत में भारत ने BRICS की अध्यक्षता चीन को सौंप दी। इस तरह नई दिल्ली सम्मेलन भारत के लिए केवल मेजबानी का आयोजन नहीं रहा, बल्कि बदलती वैश्विक शक्ति-संरचना के बीच अपनी स्वतंत्र और संतुलित कूटनीतिक भूमिका दिखाने का महत्वपू

