शरद कालीन गन्ने के साथ गेहूं की सहफसली खेती किसानों के लिए लाभ का सुनहरा अवसर साबित हो रही है। इससे न केवल खेत की उत्पादकता बढ़ती है, बल्कि लागत में कमी आने से किसानों की आर्थिक स्थिति भी मजबूत होती है। इसी महत्वपूर्ण जानकारी को उत्तर प्रदेश गन्ना किसान संस्थान प्रशिक्षण केंद्र, पिपराइच गोरखपुर के पूर्व सहायक निदेशक एवं गन्ना विशेषज्ञ श्री ओम प्रकाश गुप्ता ने ग्राम सकरौली में किसानों के बीच साझा किया।
श्री गुप्ता ने बताया कि गन्ने की बुवाई 4 फुट की दूरी पर नाली बनाकर करें और अधिक उपज देने वाली प्रजातियां को 0118, को.शा.13235, 16202, को.लख.14201 आदि का चयन करें। उन्होंने कहा कि गन्ने की दो लाइनों के बीच गेहूं की तीन पंक्तियाँ बोई जाएं। गेहूं की अधिक उत्पादन देने वाली प्रमुख प्रजातियों के रूप में डी.वी.डब्ल्यू 187, 327, एच.डी.2967, एच.डी.303 अत्यंत उपयुक्त हैं। एक एकड़ गन्ने में गेहूं की बुवाई के लिए केवल 25 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है, जिससे किसान को 16 से 18 कुंतल गेहूं तक की उपज प्राप्त की जा सकती है। बुवाई के दौरान गेहूं के लिए अलग से 50 किलोग्राम एन.पी.एस. (20-20-0-13) तथा 30 किलोग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश का प्रयोग लाभदायक रहेगा।
कार्यक्रम में उपस्थित एग्री जेनिटिक के कृषि विशेषज्ञ श्री राजेश सिंह ने किसानों को बताया कि रोटावेटर से गेहूं की बुवाई करने पर औसत उपज प्रभावित होती है। उन्होंने कहा कि जो किसान गोबर की सड़ी खाद का उपयोग नहीं करते हैं, वे एक एकड़ भूमि में 500 ग्राम से 1 किलोग्राम हियूमिक एसिड (हुबली–98%) को खाद में मिलाकर प्रयोग करें। इससे जड़ों का तेज विकास होता है, पौधे अधिक पोषक तत्व ग्रहण करते हैं और उपज बढ़ती है।
उन्होंने यह भी सलाह दी कि गेहूं, तोरिया, आलू, मसूर आदि फसलों में बुवाई के समय सोटा–सल्फर 80% की 3 से 5 किलोग्राम प्रति एकड़ मात्रा अवश्य मिलाएं। सल्फर पौधों की बढ़वार, हरियाली, प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को तेज करता है तथा यह कीटनाशक व फफूंदनाशक दोनों की तरह कार्य करता है।
कार्यक्रम में प्रमुख रूप से कृषक राजेश मौर्य, दिनेश मल्ल, रवि राय, विकास मौर्या, ओम प्रकाश एवं शिव सागर सिंह उपस्थित रहे।



