बारिश और उमस के मौसम में गन्ने की फसल पर रेड रॉट (लाल सड़न रोग) का खतरा बढ़ जाता है। यह गन्ने की प्रमुख बीमारियों में से एक है और समय रहते नियंत्रण के उपाय नहीं किए जाएं तो फसल की पैदावार और गुणवत्ता पर गंभीर असर पड़ सकता है। ऐसे में किसानों को खेतों की नियमित निगरानी करने और शुरुआती लक्षण दिखाई देते ही आवश्यक कदम उठाने की जरूरत है।
क्या है रेड रॉट रोग?
रेड रॉट गन्ने में होने वाला एक फफूंदजनित रोग है। इसे आम बोलचाल में गन्ने की गंभीर बीमारी माना जाता है। यह रोग खासकर अनुकूल मौसम और संक्रमित बीज/रोपण सामग्री के इस्तेमाल से तेजी से फैल सकता है।
रोग की शुरुआत होने पर गन्ने की पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं और पौधे की बढ़वार प्रभावित होती है। तने को लंबाई में काटने पर अंदर का ऊतक लाल या लाल-भूरे रंग का दिखाई दे सकता है। कई बार इसमें सफेद धब्बे या फफूंद जैसी संरचना भी नजर आती है।
इन लक्षणों पर रखें नजर
किसानों को खेत में इन संकेतों पर विशेष ध्यान देना चाहिए—
- गन्ने की पत्तियों का अचानक पीला पड़ना और सूखना।
- पौधों की बढ़वार कमजोर होना।
- तने को काटने पर अंदर लाल या लाल-भूरे रंग की धारियां दिखाई देना।
- संक्रमित गन्ने में दुर्गंध या ऊतक के सड़ने के लक्षण।
- खेत में कुछ पौधों के बाद आसपास के पौधों में भी बीमारी का फैलना।
शुरुआती अवस्था में रोग की पहचान होने पर इसके प्रसार को रोकना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
किसान क्या करें?
1. संक्रमित पौधों को खेत से निकालें:
जिन पौधों में रेड रॉट के स्पष्ट लक्षण दिखाई दें, उन्हें सावधानीपूर्वक उखाड़कर खेत से बाहर नष्ट करें। संक्रमित अवशेषों को खेत में न छोड़ें।
2. स्वस्थ बीज का इस्तेमाल करें:
अगली फसल के लिए केवल स्वस्थ और प्रमाणित गन्ना बीज/सेट का चयन करें। संक्रमित खेत से रोपण सामग्री लेने से बचें।
3. जल निकासी का रखें ध्यान:
खेत में लंबे समय तक पानी जमा न रहने दें। बारिश के मौसम में उचित जल निकासी व्यवस्था बीमारी के जोखिम को कम करने में मदद कर सकती है।
4. फसल की नियमित निगरानी करें:
बारिश के बाद खेतों का लगातार निरीक्षण करें। शुरुआती लक्षण मिलने पर संक्रमित पौधों को अलग करना जरूरी है।
5. फसल चक्र अपनाएं:
लगातार एक ही खेत में गन्ने की खेती करने के बजाय कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार फसल चक्र अपनाना रोग प्रबंधन में मददगार हो सकता है।
रासायनिक दवा का इस्तेमाल कब करें?
रेड रॉट के प्रबंधन के लिए किसी भी फफूंदनाशी का इस्तेमाल बिना सलाह के न करें। बीमारी की स्थिति, क्षेत्र और गन्ने की किस्म के आधार पर कृषि विशेषज्ञ या स्थानीय कृषि विभाग से अनुशंसित उपचार की जानकारी लें। संक्रमित खेत में केवल दवा के भरोसे रहने के बजाय स्वस्थ बीज, खेत की स्वच्छता और उचित जल निकासी जैसे उपायों पर भी ध्यान देना जरूरी है।
समय पर पहचान है सबसे जरूरी
रेड रॉट से बचाव में सबसे महत्वपूर्ण कदम समय पर पहचान और संक्रमित पौधों को अलग करना है। बारिश और उमस के दौरान किसान नियमित रूप से खेतों की निगरानी करें और संदिग्ध पौधे दिखाई देने पर नजदीकी कृषि विशेषज्ञ, कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग से सलाह लें।
किसानों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि रेड रॉट का प्रबंधन क्षेत्र और स्थानीय कृषि सलाह के अनुसार अलग हो सकता है। इसलिए किसी भी दवा या उपचार की मात्रा तय करने से पहले स्थानीय विशेषज्ञ की अनुशंसा लेना बेहतर है।

