नई दिल्ली। तिब्बत में हिमस्खलन के बाद नेपाल में आई भीषण बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्र में आपदा प्रबंधन और निगरानी तंत्र को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक जलवायु परिवर्तन और तेजी से हो रहे ढांचागत विकास के कारण हिमालय का संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र लगातार दबाव में है। ऐसे में भविष्य में इस तरह की घटनाओं का असर भारत के हिमालयी राज्यों तक भी पहुंच सकता है।
तिब्बत और नेपाल में हाल की आपदा ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं की समय रहते पहचान और चेतावनी देने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है। हिमालय का भौगोलिक स्वरूप बेहद संवेदनशील है और यहां हिमस्खलन, भूस्खलन, अचानक बाढ़ तथा ग्लेशियर झीलों के फटने जैसी घटनाएं बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचा सकती हैं।
ग्लेशियर झीलों की निगरानी जरूरी
हिमालयी क्षेत्र में बड़ी संख्या में ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं। तापमान बढ़ने के कारण ग्लेशियरों के पिघलने की प्रक्रिया तेज होने से कुछ झीलों का आकार बढ़ सकता है, जिससे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) का खतरा पैदा होता है। ऐसी स्थिति में अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर बहने से नदियों के किनारे बसे इलाकों में भारी तबाही हो सकती है।
ऐसे में संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की रियल-टाइम निगरानी, आधुनिक सेंसर और सैटेलाइट तकनीक के इस्तेमाल तथा समय रहते चेतावनी जारी करने की व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत है।
भारत के लिए भी सबक
हिमालयी नदियों का एक बड़ा हिस्सा भारत से होकर गुजरता है। इसलिए पड़ोसी हिमालयी क्षेत्रों में होने वाली बड़ी प्राकृतिक घटनाओं का असर भारतीय नदी घाटियों और सीमावर्ती इलाकों पर पड़ सकता है। हालिया घटनाक्रम इस बात की ओर इशारा करता है कि भारत को हिमालयी आपदाओं के लिए अपनी निगरानी और पूर्व चेतावनी प्रणाली को लगातार मजबूत करते रहना होगा।
जलवायु परिवर्तन के दौर में हिमालयी क्षेत्र में विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन भी बेहद जरूरी हो गया है। विशेषज्ञों के अनुसार आपदा के बाद राहत पहुंचाने के साथ-साथ आपदा से पहले जोखिम की पहचान, निगरानी और समय पर चेतावनी को प्राथमिकता देना भविष्य की बड़ी जरूरत है।

