नई दिल्ली। अगस्त का आखिरी सप्ताह खगोलीय घटनाओं के लिहाज से खास है। 28 अगस्त 2026 को साल का दूसरा और अंतिम चंद्र ग्रहण लगने जा रहा है। इस घटना को लेकर लोगों में उत्सुकता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि ग्रहण की तारीख रक्षाबंधन के आसपास पड़ रही है। हालांकि भारत में रहने वाले लोगों के लिए राहत की बात यह है कि यह ग्रहण भारत से दिखाई नहीं देगा।
कितने समय तक रहेगा चंद्र ग्रहण?
28 अगस्त को होने वाला चंद्र ग्रहण आंशिक प्रकृति का बताया जा रहा है। इस दौरान पृथ्वी की छाया चंद्रमा के एक हिस्से पर पड़ेगी। ग्रहण की पूरी प्रक्रिया कई चरणों में होगी और इसकी अवधि करीब तीन घंटे से अधिक रहने की जानकारी सामने आई है।
ग्रहण का वास्तविक नजारा उन्हीं क्षेत्रों से देखा जा सकेगा जहां उस समय रात का समय होगा। भारत में उस दौरान दिन रहने के कारण यहां से चंद्रमा दिखाई नहीं देगा।
भारत में दिखाई क्यों नहीं देगा?
चंद्र ग्रहण तभी देखा जा सकता है जब ग्रहण के समय किसी स्थान से चंद्रमा आकाश में दिखाई दे रहा हो। 28 अगस्त के ग्रहण के दौरान भारत में चंद्रमा क्षितिज के ऊपर मौजूद नहीं होगा। इसी वजह से देश के अलग-अलग शहरों से इसे सीधे आंखों से देख पाना संभव नहीं होगा।
दुनिया के कुछ अन्य हिस्सों में रहने वाले लोग इस खगोलीय घटना को देख सकेंगे।
क्या भारत में सूतक काल लगेगा?
हिंदू धार्मिक परंपरा में चंद्र ग्रहण से पहले सूतक काल की मान्यता है। सामान्य रूप से चंद्र ग्रहण से लगभग नौ घंटे पहले सूतक शुरू होने की बात कही जाती है।
हालांकि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ग्रहण का प्रभाव और सूतक उन स्थानों से जोड़ा जाता है जहां ग्रहण दिखाई देता है। चूंकि 28 अगस्त का चंद्र ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा, इसलिए भारत में सूतक काल को मान्य नहीं माना जा रहा है।
इस वजह से यहां सामान्य धार्मिक गतिविधियों पर ग्रहण के कारण रोक नहीं रहेगी।
रक्षाबंधन पर क्या पड़ेगा असर?
ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देने के कारण रक्षाबंधन के पर्व पर इसका प्रत्यक्ष धार्मिक प्रभाव नहीं माना जा रहा है। ऐसे में लोग स्थानीय पंचांग और परंपरा के अनुसार रक्षाबंधन से जुड़े कार्यक्रम कर सकते हैं।
हालांकि अलग-अलग परिवारों और धार्मिक परंपराओं में मान्यताएं अलग हो सकती हैं। इसलिए पूजा-पाठ या शुभ कार्य के लिए अपने क्षेत्र के पंचांग अथवा विद्वान की सलाह लेना बेहतर रहेगा।
खगोलीय घटना है चंद्र ग्रहण
चंद्र ग्रहण मूल रूप से एक प्राकृतिक खगोलीय घटना है। जब पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाती है और पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है, तब चंद्र ग्रहण की स्थिति बनती है।
इसका वैज्ञानिक कारण पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा की स्थिति से जुड़ा है, जबकि सूतक और धार्मिक नियम धार्मिक मान्यताओं का हिस्सा हैं।
डिस्क्लेमर: चंद्र ग्रहण से जुड़े सूतक और धार्मिक नियम परंपरागत मान्यताओं पर आधारित हैं। अलग-अलग पंचांग और परंपराओं में नियमों में अंतर हो सकता है।
