लखनऊ। हिंदू धर्म में तीज पर्वों का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व माना जाता है। इन्हीं में से एक है कजरी तीज, जिसे भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। वर्ष 2026 में कजरी तीज का पर्व 1 सितंबर, मंगलवार को मनाया जाएगा।
कजरी तीज विशेष रूप से महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। इस दिन विवाहित महिलाएं पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना से व्रत रखती हैं। वहीं, अविवाहित युवतियां भी अच्छे जीवनसाथी की कामना से यह व्रत करती हैं।
भगवान शिव और माता पार्वती से जुड़ी है मान्यता
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कजरी तीज का संबंध भगवान शिव और माता पार्वती से है। कहा जाता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी इसी तपस्या और समर्पण को वैवाहिक सुख एवं अखंड सौभाग्य से जोड़कर देखा जाता है।
इसी मान्यता के चलते महिलाएं कजरी तीज के दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं और अपने दांपत्य जीवन की खुशहाली की प्रार्थना करती हैं।
कजरी नाम क्यों पड़ा?
कजरी तीज का नाम वर्षा ऋतु में गाए जाने वाले कजरी लोकगीतों से भी जुड़ा माना जाता है। भादों के महीने में बारिश, हरियाली और सुहावने मौसम के बीच ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं पारंपरिक कजरी गीत गाती थीं।
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर, वाराणसी और आसपास के क्षेत्रों में कजरी गायन की समृद्ध लोक परंपरा रही है। यहां कजरी गीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि लोकजीवन, विरह, प्रेम और सामाजिक रिश्तों को व्यक्त करने का जरिया भी रहे हैं।
पहले कजरी तीज कैसे मनाई जाती थी?
पुराने समय में कजरी तीज धार्मिक पर्व के साथ-साथ महिलाओं के लिए सामाजिक मेल-मिलाप का अवसर भी हुआ करती थी। महिलाएं अपने मायके जाती थीं, सहेलियों और रिश्तेदारों के साथ मिलकर झूले झूलती थीं और सामूहिक रूप से कजरी गीत गाती थीं।
ग्रामीण समाज में यह पर्व महिलाओं को एक-दूसरे के साथ समय बिताने और अपनी लोक परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण अवसर देता था। समय के साथ पर्व मनाने के तौर-तरीकों में बदलाव आया, लेकिन इसकी धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता आज भी बनी हुई है।
क्यों महत्वपूर्ण है कजरी तीज?
कजरी तीज को केवल व्रत और पूजा तक सीमित नहीं माना जाता। यह पर्व दांपत्य प्रेम, पारिवारिक सुख, लोक संस्कृति और महिला सामाजिक सहभागिता से भी जुड़ा हुआ है।
आज भी कई क्षेत्रों में महिलाएं पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ कजरी तीज मनाती हैं। पूजा-पाठ के साथ लोकगीत, झूले और पारंपरिक आयोजन इस पर्व की सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखते हैं।
डिस्क्लेमर: कजरी तीज की पूजा-विधि, व्रत और मुहूर्त से जुड़ी परंपराएं क्षेत्र और परिवार की मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं। स्थानीय पंचांग के अनुसार तिथि और पूजा का समय देखना उचित है।
